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नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल डिप्टी स्पीकर की रेस में! संसद में छिड़ी नई सियासी बहस

March 12, 2026 1:37 PM
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ओवैसी की मांग: हनुमान बेनीवाल को बनाया जाए लोकसभा डिप्टी स्पीकर, चंद्रशेखर और राजकुमार रोत के साथ लाएंगे प्रस्ताव

भारत की संसद में इन दिनों राजनीतिक हलचल तेज है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चल रही बहस के बीच एक ऐसा बयान सामने आया जिसने पूरे सदन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने राजस्थान के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) सांसद हनुमान बेनीवाल को लोकसभा का डिप्टी स्पीकर बनाए जाने की मांग कर दी।

ओवैसी ने यह भी घोषणा की कि वे इस मुद्दे पर अकेले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे उत्तर प्रदेश के सांसद चंद्रशेखर आजाद और राजस्थान के सांसद राजकुमार रोत के साथ मिलकर एक आधिकारिक प्रस्ताव लोकसभा में लाने वाले हैं। इस बयान के बाद संसद की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है।

लोकसभा में उठी नई मांग

संसद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने सदन में अपनी बात रखते हुए कहा कि लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद लंबे समय से खाली है और संविधान के अनुसार यह पद होना अनिवार्य है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि यह पद विपक्ष के किसी मजबूत नेता को दिया जाए ताकि संसद में संतुलन बना रहे।

मुख्य बात: असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार डिप्टी स्पीकर का पद अनिवार्य है और इसे विपक्ष के किसी मजबूत सांसद को दिया जाना चाहिए।

ओवैसी ने सदन में कहा कि सरकार संसद पर नियंत्रण रखना चाहती है, इसलिए डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं कराया जा रहा। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया।

ओवैसी, चंद्रशेखर और रोत मिलकर लाएंगे प्रस्ताव

ओवैसी ने साफ शब्दों में कहा कि वे इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव लेकर आएंगे। उन्होंने कहा कि वे चंद्रशेखर आजाद और राजकुमार रोत के साथ मिलकर इस मांग को औपचारिक रूप से लोकसभा में रखेंगे।

ओवैसी का बयान:
“मैं, चंद्रशेखर आजाद और राजकुमार रोत मिलकर प्रस्ताव लाएंगे कि हनुमान बेनीवाल को लोकसभा का डिप्टी स्पीकर बनाया जाए।”

ओवैसी ने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता कि अन्य सांसद जैसे पप्पू यादव इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगे या नहीं, लेकिन वे इस मुद्दे को संसद में उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।

इतिहास का हवाला देकर ओवैसी ने किया हमला

Image Credit: Gemini AI

ओवैसी ने अपने भाषण में संसद के इतिहास का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहले के दौर में लोकसभा अध्यक्ष का पद बहुत शक्तिशाली माना जाता था।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय ऐसा भी था जब लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना संसद परिसर से किसी सांसद को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

उन्होंने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और हुकुम सिंह का नाम लेते हुए कहा कि उन दिनों स्पीकर की गरिमा और अधिकारों का पूरा सम्मान किया जाता था।

ऐतिहासिक संदर्भ: ओवैसी ने संसद में बताया कि पहले के दौर में स्पीकर की अनुमति के बिना संसद परिसर से किसी सांसद को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

ओवैसी ने मनीराम बागड़ी का उदाहरण भी दिया, जो जवाहरलाल नेहरू के समय गिरफ्तारी से बचने के लिए संसद परिसर में ही टेंट लगाकर रहने लगे थे।

बेनीवाल का तीखा तंज

जब इस मुद्दे पर हनुमान बेनीवाल को बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने अपने खास अंदाज में प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर हल्का व्यंग्य करते हुए कहा कि भले ही वे राजस्थान से आते हैं, लेकिन सदन में छोटी पार्टियों और निर्दलीय सांसदों की हालत काफी खराब है।

हनुमान बेनीवाल का तंज:
“सदन में एक सीट वाली पार्टियों और निर्दलीय सांसदों की हालत वैसी ही हो गई है जैसे ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध में भारत की स्थिति होती है।”

बेनीवाल ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने के बजाय इस्तीफा दे देना चाहिए था।

संसद की राजनीति में नया समीकरण?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी द्वारा हनुमान बेनीवाल का नाम आगे बढ़ाना केवल एक सुझाव नहीं बल्कि एक रणनीतिक राजनीतिक कदम हो सकता है।

बेनीवाल राजस्थान की राजनीति में प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। वहीं राजकुमार रोत भी आदिवासी राजनीति का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। इसके अलावा चंद्रशेखर आजाद उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के मजबूत नेता हैं।

इन तीनों नेताओं का एक मंच पर आना संसद में एक नए राजनीतिक दबाव समूह के रूप में देखा जा रहा है।

क्या बदलेगा संसद का समीकरण?

अगर लोकसभा में यह प्रस्ताव आधिकारिक रूप से लाया जाता है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि विभिन्न राजनीतिक दल इसका समर्थन करते हैं या नहीं।

एनडीए और विपक्षी इंडिया गठबंधन दोनों के लिए यह एक अहम राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के जरिए विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि जब यह प्रस्ताव लोकसभा में पेश होगा तो किस-किस दल का समर्थन मिलेगा।

अगर यह प्रस्ताव गंभीरता से चर्चा में आता है तो संसद की राजनीति में एक नया मोड़ भी देखने को मिल सकता है।

हालांकि यह भी संभव है कि सरकार इस प्रस्ताव को स्वीकार न करे। लेकिन इतना तय है कि ओवैसी के इस बयान ने संसद में नई बहस जरूर शुरू कर दी है।

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